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नज़्म
मैं नहीं तो क्या
जिलौ में नग़मा-ओ-रंग-ओ-बहार-ओ-नूर लिए
हयात गर्म-ए-तग-ओ-दौ है मैं नहीं तो क्या
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
गरचे हैं मूनिस-ओ-ग़म-ख़्वार तग-ओ-दौ में सही
पर तिरी तब' को कब राह पे ला सकते हैं
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
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नज़्म
ख़ुदा गवाह
मिरी हयात के इक इक वरक़ पे लिक्खी है
जो तू ने राह में छोड़ा था परचम-ए-तग-ओ-दौ
यहया अमजद
नज़्म
तमाशा-गह-ए-लाला-ज़ार
हमारे नए ख़्वाब हैं आदम-ए-नौ के ख़्वाब
जहान-ए-तग-ओ-दौ के ख़्वाब









