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ग़ज़ल
कुछ भी हूँ फिर भी दुखे दिल की सदा हूँ नादाँ
मेरी बातों को समझ तल्ख़ी-ए-तक़रीर न देख
मजरूह सुल्तानपुरी
नज़्म
इल्तिजा-ए-मुसाफ़िर
मिरी ज़बान-ए-क़लम से किसी का दिल न दुखे
किसी से शिकवा न हो ज़ेर-ए-आसमाँ मुझ को
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
कलीम आजिज़
समस्त
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नज़्म
ख़ुदा हमारा है
खिलेंगे फूल नज़र के सहर की बाँहों में
दुखे दिलों को इसी आस का सहारा है
हबीब जालिब
ग़ज़ल
दिल ही थे हम दुखे हुए तुम ने दुखा लिया तो क्या
तुम भी तो बे-अमाँ हुए हम को सता लिया तो क्या
उबैदुल्लाह अलीम
ग़ज़ल
कलीम आजिज़
ग़ज़ल
दिल-दुखे रोए हैं शायद इस जगह ऐ कू-ए-दोस्त
ख़ाक का इतना चमक जाना ज़रा दुश्वार था
