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ग़ज़ल
उन ने कहा ये मुझ से अब छोड़ दुख़्त-ए-रज़ को
पीरी में ऐ दिवाने ये कौन मस्तियाँ हैं
मोहम्मद रफ़ी सौदा
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ग़ज़ल
शहज़ादी दुख़्त-ए-रज़ के हज़ारों हैं ख़्वास्त-गार
चुप मुर्शिद-ए-मुग़ाँ है किसे दूँ किसे न दूँ
अमीर मीनाई
ग़ज़ल
सफ़ी औरंगाबादी
ग़ज़ल
नसीहत है अबस नासेह बयाँ नाहक़ ही बकते हैं
जो बहके दुख़्त-ए-रज़ से हैं वो कब इन से बहकते हैं
भारतेंदु हरिश्चंद्र
नज़्म
बेबसी
खेमा-ए-ग़म की तनाब-ए-रेशमीं टूटी नहीं
तीरगी के राहज़न ने दुख़्त-ए-रज़ लूटी नहीं
मुनीर नियाज़ी
ग़ज़ल
दौर-ए-साग़र में नहीं कफ़ सर-ए-बादा साक़ी
दुख़्त-ए-रज़ शैख़ की दस्तार लिए फिरती है
इम्दाद इमाम असर
शेर
इजाज़त माँगती है दुख़्त-ए-रज़ महफ़िल में आने की
मज़ा हो शैख़-साहिब कह उठें बे-इख़्तियार आए
बेख़ुद देहलवी
ग़ज़ल
इजाज़त माँगती है दुख़्त-ए-रज़ महफ़िल में आने की
मज़ा हो शैख़-साहिब कह उठें बे-इख़्तियार आए
बेख़ुद देहलवी
ग़ज़ल
शीशे के बीच दुख़्त-ए-रज़ करती है शोख़-चश्मियाँ
तू भी टुक अपनी चश्म की उस को भड़क दिखा कि यूँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
फ़स्ल-ए-गुल में रंग लाया है शबाब-ए-दुख़्त-रज़
छेड़ती है आ के रातों को ये मस्तानी मुझे
रियाज़ ख़ैराबादी
ग़ज़ल
कई रिंद-शैख़ ऐसे भी हैं दुख़्त-ए-रज़ पे शैदा
जो हलाल कर के रख देंगे हराम कर के देखो

