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नज़्म
एक आरज़ू
मेहंदी लगाए सूरज जब शाम की दुल्हन को
सुर्ख़ी लिए सुनहरी हर फूल की क़बा हो
अल्लामा इक़बाल
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ग़ज़ल
मुझे हादसों ने सजा सजा के बहुत हसीन बना दिया
मिरा दिल भी जैसे दुल्हन का हाथ हो मेहँदियों से रचा हुआ
बशीर बद्र
नज़्म
अकेले कमरे में
ख़बर सुनी है कभी जब तुम्हारे आने की
मैं आइने में दुल्हन बन के मुस्कुराई हूँ
कफ़ील आज़र अमरोहवी
ग़ज़ल
ज़िक्र जिस दम भी छिड़ा उन की गली में मेरा
जाने शरमाए वो क्यूँ गाँव की दुल्हन की तरह
गोपालदास नीरज
नज़्म
बाज़-आमद --- एक मुन्ताज
और दुल्हन पे हुआ कितना बिखेर
कुछ न कुछ कहती रहीं सब ही मगर मैं ने सिर्फ़
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
आधी रात
दुल्हन हो जैसे हया की सुगंध से बोझल
ये मौज-ए-नूर ये भरपूर ये खिली हुई रात





