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ग़ज़ल
है सौ अदाओं से उर्यां फ़रेब-ए-रंग-ए-अना
बरहना होती है लेकिन हिजाब-ए-ख़्वाब के साथ
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
ये वक़्त का है तक़ाज़ा कि है फ़रेब-ए-नज़र
कि बेटा बाप के क़द से बड़ा दिखाई दे
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
ग़ज़ल
फ़रेब-ए-वा'दा-ए-फ़र्दा बहुत ही 'आरज़ी शय है
रहेंगे 'उम्र भर इस दिल पे चोटों के निशाँ बाक़ी
रुख़्साना निकहत लारी उम्म-ए-हानी
ग़ज़ल
'अहद-ए-नौ में कुछ नहीं मिलता है क़ीमत के बग़ैर
अब मसीहा ने रविश अपनी पुरानी छोड़ दी
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
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ग़ज़ल
कितने अज़ीज़ हैं ये मसीहा को क्या ख़बर
वो ज़ख़्म-ए-दिल जो लज़्ज़त-ए-आज़ार तक गए
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
रुख़्साना निकहत लारी उम्म-ए-हानी
ग़ज़ल
हुस्न का तालिब अगर है इश्क़ के आज़ार खींच
सदमा-ए-हिज्र-ए-मसीहा ऐ दिल-ए-बीमार खींच
शाह अकबर दानापुरी
ग़ज़ल
कुश्ता-ए-लब हो के कीजे जावेदाँ अब ज़िंदगी
क्यूँ अबस मिन्नत-कश-ए-ख़िज़्र-ओ-मसीहा होजिए
रज़ा अज़ीमाबादी
नज़्म
क़दम मिला के चलो
तुम्हारे अज़्म से इंसान पाए ग़म से नजात
मिसाल-ए-ख़िज़्र-ओ-मसीहा बने तुम्हारी ज़ात
सय्यदा फ़रहत
ग़ज़ल
हिज्र में खुलते हैं असरार-ए-मोहब्बत क्या क्या
ग़म में ये मो'जिज़ा-ए-हुस्न-ए-मसीहा ही सही