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ग़ज़ल
यूँ आई फ़र्त-ए-ग़म में किसी गुल-बदन की याद
सहरा में जैसे आए बहार-ए-चमन की याद
क़ाज़ी गुलाम मोहम्मद
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ग़ज़ल
किसी के भूल जाने से मोहब्बत कम नहीं होती
मोहब्बत ग़म तो देती है शरीक-ए-ग़म नहीं होती
ग़म बिजनौरी
ग़ज़ल
अरे 'ग़म' लग़्ज़िश-ए-सोज़-ए-जिगर का कैफ़ क्या कहिए
ज़बाँ मजबूर हो जाती है जब दिल में उतरती है
ग़म बिजनौरी
नज़्म
तजस्सुस
काएनात-ए-ज़ीस्त पर अफ़्सुर्दगी सी छा गई
फ़र्त-ए-ग़म से दिल मिरा वीरानियों में खो गया
सिद्दीक़ कलीम
ग़ज़ल
फ़र्त-ए-ग़म में हम उसी मंज़िल पे जा पहोंचे जहाँ
हम-ज़बाँ कोई नहीं है हम-सफ़र कोई नहीं
मुसव्विर लखनवी
ग़ज़ल
मैं दानिस्ता हर इक बज़्म-ए-तरब से दूर रहता हूँ
कि फ़र्त-ए-ग़म में औरों की ख़ुशी देखी नहीं जाती