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शेर
तह-ए-आरिज़ जो फ़रोज़ाँ हैं हज़ारों शमएँ
लुत्फ़-ए-इक़रार है या शोख़ी-ए-इंकार का रंग
अली सरदार जाफ़री
ग़ज़ल
ग़म्ज़ा-ओ-नाज़-ओ-अदा शोख़ी-ओ-बेबाकी-ओ-हुस्न
एक ही जुर्म-ए-गुनह में हुए क़ातिल दो-चार
अहमद हसन फ़िदा
ग़ज़ल
जब 'फ़िदा' वो काएनात-ए-दिल में रहता ही नहीं
फिर तिरी यादों पर उस का इस क़दर पहरा है क्यों
वसीम अहमद फ़िदा
ग़ज़ल
जिन को दुनिया से मोहब्बत है ख़ुदा से बढ़ कर
ऐ 'फ़िदा' उन पे तो रहमत नहीं होने वाली
वसीम अहमद फ़िदा
ग़ज़ल
भूले हैं अपने फ़र्ज़ को ये ख़्वाजगान-ए-हिन्द
हक़ देने में भी करते हैं इंकार आज-कल
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
अब कोई तिरा मिस्ल नहीं नाज़-ओ-अदा में
अंदाज़ में शोख़ी में शरारत में हया में


