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ग़ज़ल
सिगरेट मुँह में उल्टी रख कर फिल्टर को सुलगाता है
'पागल' तू है पूरा पगला ये मालूम न वो मालूम
पागल आदिलाबादी
नज़्म
शिकवा
थी न कुछ तेग़ज़नी अपनी हुकूमत के लिए
सर-ब-कफ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिए
अल्लामा इक़बाल
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नज़्म
फ़र्ज़ करो
जोगी भी जो नगर नगर में मारे मारे फिरते हैं
कासा लिए भबूत रमाए सब के द्वारे फिरते हैं
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
अब वो फिरते हैं इसी शहर में तन्हा लिए दिल को
इक ज़माने में मिज़ाज उन का सर-ए-अर्श-ए-बरीं था


