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नज़्म
दर्द-ए-दिल
क्यूँ डराते हैं अबस गबरू मुसलमाँ मुझ को
क्या मिटाएगी भला गर्दिश-ए-दौराँ मुझ को
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
हरम क्या दैर क्या दोनों ये वीराँ होते जाते हैं
तुम्हारे मो'तक़िद गबरू मुसलमाँ होते जाते हैं
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
ईद का मेला
तर हलवा गर्म कड़ाही में दो लोटे हैं इक ठेला है
यारो ये ईद का मेला है
सय्यद ज़मीर जाफ़री
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शेर
हम गबरू हम मुसलमाँ हम जम्अ हम परेशाँ
इक सिलसिला बंधा उस ज़ुल्फ़-ए-दोता से देखा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
सिलसिला गबरू मुसलमाँ की अदावत का मिटा
ऐ परी बे-पर्दा हो कर सुब्हा-ए-ज़ुन्नार तोड़
मुनीर शिकोहाबादी
ग़ज़ल
ये मुटियारें छैल-छबेली ये गबरू बाँके अलबेले
जाती है किस रूप नगर को ये टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडी
शुरेश चंद्र शौक
ग़ज़ल
ग़ैर की नज़रों से बच कर सब की मर्ज़ी के ख़िलाफ़
वो तिरा चोरी-छुपे रातों को आना याद है
हसरत मोहानी
ग़ज़ल
हुए मर के हम जो रुस्वा हुए क्यूँ न ग़र्क़-ए-दरिया
न कभी जनाज़ा उठता न कहीं मज़ार होता
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
शिकवा
फिर ये आज़ुर्दगी-ए-ग़ैर सबब क्या मा'नी
अपने शैदाओं पे ये चश्म-ए-ग़ज़ब क्या मा'नी





