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नज़्म
नया जन्म
वो गप शप क़हक़हे वो अपने अपने इश्क़ के क़िस्से
वो मीरास रोड की बातें वो चर्चे ख़ूब-रूयों के
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
ग़ज़ल
लीडरी चाहो तो लफ़्ज़-ए-क़ौम है मेहमाँ-नवाज़
गप-नवीसों को और अहल-ए-मेज़ को राज़ी करो
अकबर इलाहाबादी
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ग़ज़ल
है जिंस परी सा कुछ आदम तो नहीं असलन
इक आग लगा दी है उस अमर्द-ए-ख़ुश-गप ने
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
नज़्म
फेंकू राम
नाम तो उन का सेवक राम था बन गए फेंकू राम
उन के ग़लत तरीक़ों ने ही किया उन्हें बदनाम
मेहदी प्रतापगढ़ी
ग़ज़ल
मिलना-जुलना गप्प ठहाके पल पल अपने साथ चले
आख़िरी शब सब छूट गए बस इक साथी था सन्नाटा




