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ग़ज़ल
डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन पर
वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
मरने वालो आओ अब गर्दन कटाओ शौक़ से
ये ग़नीमत वक़्त है ख़ंजर कफ़-ए-क़ातिल में है
बिस्मिल अज़ीमाबादी
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विषय
गरेबान
गरेबान शायरी
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gardan
गर्दन گَرْدَن
प्राणियों के धड़ और सिर के बीच का अंग, सर और तन का मध्यम हिस्सा, ग्रीवा, गला, हलक़, गरदन
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नज़्म
दो इश्क़
आँखों से लगाया है कभी दस्त-ए-सबा को
डाली हैं कभी गर्दन-ए-महताब में बाहें
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
फ़ना बुलंदशहरी
नज़्म
हसन कूज़ा-गर (1)
वो हम से ख़ुद अपने अमल से
ख़ुदा-वंद बन कर ख़ुदाओं के मानिंद है रू-ए-गरदाँ!
नून मीम राशिद
नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
वो नुमूद-ए-अख़्तर-ए-सीमाब-पा हंगाम-ए-सुब्ह
या नुमायाँ बाम-ए-गर्दूं से जबीन-ए-जिब्रईल




