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नज़्म
जफ़ा-ए-दिल-शिकन
ये नई है गर्दिश-ए-चर्ख़-ए-कुहन
दुश्मन-ए-जाँ है जफ़ा-ए-दिल-शिकन
ग़ुलाम दस्तगीर मुबीन
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नज़्म
महात्मा-गाँधी
वहशत-ज़दा माहौल-ए-सियह में ऐ चर्ख़
इक शम्अ' उख़ुव्वत की जल्लादी उस ने
चरख़ चिन्योटी
ग़ज़ल
गर्दिश-ए-चर्ख़ का रुख़ हो कि ज़माने का मिज़ाज
सिर्फ़ हम दीदा-ए-बेदार से पहचानते हैं
मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा
नज़्म
भगवान-राम
मौजज़न है जिस में ऐ चर्ख़ इक सुरूर-ए-सरमदी
मेरी दुनिया है तसद्दुक़ इस छलकते जाम पर
चरख़ चिन्योटी
ग़ज़ल
मक़्सद था मिले ग़म से नजात इस लिए ऐ 'चर्ख़'
इक उम्र मिरी वक़्फ़-ए-ख़िराजात हुई है