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नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
जू-ए-शीर-ओ-तेशा-ओ-संग-ए-गराँ है ज़िंदगी
बंदगी में घट के रह जाती है इक जू-ए-कम-आब
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
कोई आशिक़ किसी महबूबा से!
याद की राहगुज़र जिस पे इसी सूरत से
मुद्दतें बीत गई हैं तुम्हें चलते चलते
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
फ़लक देता है जिन को 'ऐश उन को ग़म भी होते हैं
जहाँ बजते हैं नक़्क़ारे वहीं मातम भी होते हैं
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल
फ़रंगी शीशागर के फ़न से पत्थर हो गए पानी
मिरी इक्सीर ने शीशे को बख़्शी सख़्ती-ए-ख़ारा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
झूटी मोहब्बत
मैं अपने तौर तुम्हें इस्तिमाल करता हूँ
ये ज़िंदगी है यहाँ घात में है हर कोई
शकील आज़मी
हास्य
आँखें वो फ़ित्ना-ए-दौराँ कि गुनहगार करें
गाल वो सुब्ह-ए-दरख़्शाँ कि मलक प्यार करें






