aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "gat-pat"
पाक किताब घर, ढाका
पर्काशक
साथ ग़ैरों के है सदा गट-पटइक हमीं से रखे है दिल में कपट
अपने घर पर बुला लिया उस नेदीप सारे बुझा दिया उस ने
कल आएँगे वो घर परआँख अभी से है दर पर
घाट पर ख़त्म हर कहानी हैराख ही आख़िरी निशानी है
घात पर घात है और मत पूछिएक्या मुलाक़ात है और मत पूछिए
आधुनिक उर्दू नज़्म के संस्थापकों में शामिल। अग्रणी फ़िल्म-संवाद लेखक। फ़िल्म ' वक़्त ' और ' क़ानून ' के संवादों के लिए मशहूर।
रफ़्तगाँ की याद से किसे छुटकारा मिल सकता है। गुज़रे हुए लोगों की यादें बराबर पलटती रहती हैं और इंसान बे-चैनी के शदीद लमहात से गुज़रता है। तख़्लीक़ी ज़हन की हस्सासियत ने इस मौज़ू को और भी ज़्यादा दिल-चस्प बना दिया है और ऐसे ऐसे बारीक एहसासात लफ़्ज़ों में क़ैद हो गए हैं जिनसे हम सब गुज़रते तो हैं लेकिन उन पर रुक कर सोच नहीं सकते। हमारा ये इन्तिख़ाब पढ़िए और अपने अपने रफ़्तगाँ की नए सिरे से बाज़ियाफ़्त कीजिए।
अच्छे लोग कभी नहीं मरते वो अपनी माद्दी जिस्मानी सूरत से तो आज़ाद हो जाते हैं लेकिन उनकी यादें दिलों में हमेशा घर किए रहती हैं और हम उन्हें वक़्तन फ़वक़्तन याद करते रहते हैं। यहाँ हम कुछ ऐसे ही शेर पेश कर रहे हैं जो गुज़रे हुओं को याद करने और उन्हें ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करने की मुख़्तलिफ़ सूरतों, जज़्बों और एहसासात की तर्जुमानी करते हैं।
Tipu Shaheed Ki Akhri Aaram Gah par
शमीम तारिक़
Japani Bachchon Ke Geet
Sunehri Git
जगत सिंह
नज़्म
Yaadgar-e-Gham
मतबूआ आर्मी प्रेस, दिल्ली
मुसद्दस
पंडित दौलत राम
Ram Barsha
गीत
Farz Ki Qurban-Gah Par
जमील मज़हरी
उपन्यासिका
Bazm-e-Matam
मोहम्मद अब्दुर्रज़्ज़ाक़
मर्सिया
Elis Aina Ghar Mein
लुईस कैरोल
Baaz Ke Par Ghas Aur Chingariyan
अयाज़ अहमद क़ुरैशी
शाइरी
Teele Par Ghar
निरंकार देव सेवक
कहानी
अकसीर-ए-ग़म
मीर ग़ुलाम अली जोश
Gaate Huroof
हशमत कमाल पाशा
Al-Ehata Fee Akhbar-e-Ghar Natah
मोहम्मद लिसानुद्दीन बिल ख़तीब
अनुवाद
चमेली घास पर बिखरी पड़ी हैहवा ये बाग़ में कैसी चली है
तुम्हें क्या चाहिए फिर ज़िंदगी मेंतुम अपने ख़्वाब घर पर छोड़ आओ
इश्क़ के घाट पर सँभल कर चढ़क्यों कि उस का चढ़ाओ मुश्किल है
घास पर खेलता है इक बच्चापास माँ बैठी मुस्कुराती है
तू नहाने घाट पर आया तो दरिया जल गयाआतिश-ए-रुख़ से तिरे जो कुछ वहाँ था जल गया
हर इक गाम परएक मद्धम सी आवाज़ कहती है
सहे ग़म पए रफ़्तगाँ कैसे कैसेमिरे खो गए कारवाँ कैसे कैसे
जाते-जाते गले ये ग़म पड़ जाता हैअच्छा-ख़ासा बंदा कम पड़ जाता है
हौज़ के साथ साथ उगी सब्ज़ घास परधूप की लरज़िशें
शोर से बच्चों के घबराते हैं घर पर और हमवर्ना ख़ुद ही सोचिए साहब कि दफ़्तर और हम
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