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ग़ज़ल
सच तो है अपनी ही ग़फ़लत ने है रौंदा हम को
किस लिए हम गिला-ए-गर्दिश-ए-अय्याम करें
रहमत इलाही बर्क़ आज़मी
ग़ज़ल
है दौर-ए-जहाँ में मुझे सब शिकवा तुझी से
क्यूँ कुछ गिला-ए-गर्दिश-ए-अय्याम करूँ मैं
आफ़ताब शाह आलम सानी
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ग़ज़ल
दास्तान-ए-गर्दिश-ए-अय्याम लिखता जाऊँगा
मैं मुअर्रिख़ हूँ तिरा अंजाम लिखता जाऊँगा
बिस्मिल्लाह अदीम
ग़ज़ल
कभी जब दास्तान-ए-गर्दिश-ए-अय्याम लिखता हूँ
तो फिर उनवान की सूरत में अपना नाम लिखता हूँ
वलीउल्लाह वली
ग़ज़ल
शाम-ए-फ़ुर्क़त इंतिहा-ए-गर्दिश-ए-अय्याम है
जितनी सुब्हें हो चुकी हैं आज सब की शाम है
सीमाब अकबराबादी
ग़ज़ल
वो इंसाँ जो शिकार-ए-गर्दिश-ए-अय्याम होता है
भला करता है दुनिया का मगर बदनाम होता है
ग़ुबार किरतपुरी
ग़ज़ल
एहतिराम-ए-गर्दिश-ए-अय्याम करना ही पड़ा
ग़म ग़लत करने को शग़्ल-ए-जाम करना ही पड़ा
अख़्तर सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
शिकवा-ए-गर्दिश-ए-अय्याम भी कर लें कुछ देर
दिल को हसरत-कश-ए-आराम भी कर लें कुछ देर
साक़िब कानपुरी
ग़ज़ल
कुश्तगान-ए-गर्दिश-ए-अय्याम होना था हुए
गुम थे हम ख़्वाबों में जो अंजाम होना था हुए
साहबज़ादा मीर बुरहान अली खां कलीम
ग़ज़ल
फ़ित्ना-ए-गर्दिश-ए-अय्याम से जी डरता है
साया-ए-ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम से जी डरता है



