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नज़्म
अदम ख़्वाब के ख़्वाब में
छान कर देख ली रेग-ए-दश्त-ए-ज़ियाँ
ढूँढ पाए न हम दूसरा आसमाँ
नाहीद क़मर
ग़ज़ल
कोई आज़ुर्दा करता है सजन अपने को हे ज़ालिम
कि दौलत-ख़्वाह अपना 'मज़हर' अपना 'जान-ए-जाँ' अपना
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
ग़ज़ल
बस यही ख़ाकिस्तर-ए-जाँ है यहाँ अपनी शनाख़्त
हो गया सारा बदन जब राख तो चमका हुनर
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
मुझ को मेरी आगही आँखों से ओझल कर गई
उस ने जो कुछ लौह-ए-जाँ पर लिख दिया रौशन हुआ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
जिस्म-ए-ख़ाकी तुझ को शीशे की हवेली ही सही
ऐ चराग़-ए-जाँ कभी फ़ानूस के बाहर तो आ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
सफ़ीर-ए-जाँ हूँ हिसार-ए-बदन में क्या ठहरूँ
चमन-परस्तो न ख़ुशबू के बाल-ओ-पर बाँधो
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
चराग़-ए-ज़िंदगी है या बिसात-ए-आतिश-ए-रफ़्ता
जला कर रौशनी दहलीज़-ए-जाँ पर सोचते रहना



