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ग़ज़ल
वो ज़हर-ए-ख़ंद जो घोले हैं चश्म ओ लब ने तिरे
तुझे ख़ुशी हो तो पूछें कि ज़ेर-ए-लब क्या है
सिद्दीक़ मुजीबी
नज़्म
लुढ़कता पत्थर
जिस ने आँखों में सितारे से कभी घोले थे
आज एहसास पे काजल सा बिखेरा उस ने
क़तील शिफ़ाई
नज़्म
प्यारी माँ
या दिन और रात की क़ैद से आरी अंत ज़माना बहता है
क्या सूरज गोले की चंद किरनें अंदर जा के गिरती हैं
नजमा साक़िब
नज़्म
दिसम्बर
दूर गगन पर नट-खट बादल सभा सजाने बैठे
उजले उजले ऊन के गोले लाए दिसम्बर बाबा


