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कुल्लियात
गुल-बर्ग से हैं नाज़ुक ख़ूबी-ए-पा तो देखो
क्या है झमक कफ़क की रंग-ए-हिना तो देखो
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
गुल-बर्ग सी ज़बाँ से बुलबुल ने क्या फ़ुग़ाँ की
सब जैसे उड़ गई है रंगीनी गुल्सिताँ की
मीर तक़ी मीर
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gul-barg
गुल-बर्ग گُل بَرْگ
गुलाब की पंखुड़ियां, कवियों ने प्रेमिका के होंठ और जीभ की तुलना गुलाब की पंखुड़ी से की है
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ग़ज़ल
गुलचीं समझ के चुनियो कि गुलशन में 'मीर' के
लख़्त-ए-जिगर पड़े हैं नहीं बर्ग-हा-ए-गुल
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
गुलचीं समझ के चुनियो कि गुलशन में 'मीर' के
लख़्त-ए-जिगर पड़े हैं नहीं बर्ग-हा-ए-गुल
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
क्या क्या न तेरे सदमे से बाद-ए-ख़िज़ाँ गिरा
गुल बर्ग सर्व फ़ाख़्ता का आशियाँ गिरा
शैख़ अली बख़्श बीमार
नज़्म
बेले के फूल
कुछ ही गुल-बर्ग जो ऊपर को उठाए हैं सर
कुछ झुकी जाती हैं नीचे की तरफ़ पंखुड़ियाँ
सलाम संदेलवी
कुल्लियात
था वस्फ़ उन लबों का ज़बान-ए-क़लम पे 'मीर'
या मुँह में ‘अंदलीब के थे बर्ग-हा-ए-गुल
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
हूँ दाग़-ए-नाज़ुकी कि किया था ख़याल-ए-बोस
गुल-बर्ग सा वो होंट जो था नीलगूँ हुआ
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
गुल-बर्ग से नाज़ुक-बदन सर पाँव से रश्क-ए-चमन
ज़र्रीं ओ सीमीं पैरहन दिलकश मकानों के मकीं
नज़ीर अकबराबादी
कुल्लियात
हैं पाँव उस के नाज़ुक गुल-बर्ग से बजा है
आशिक़ जो रहगुज़र में आँखों के तीं बिछावे
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
गुल-बर्ग पे रखते ही क़दम हँस के जो खींचा
शायद हुई सख़्ती से रग-ए-गुल ख़िला-ए-पा
नज़ीर अकबराबादी
कुल्लियात
आँखें लगी रहती हैं अक्सर चाक-ए-क़फ़स से असीरों की
झोंका बाद-ए-बहारी का गुल-बर्ग कोई याँ लावेगा
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
गुल-बर्ग से नाज़ुक बदन सर पाँव से रश्क-ए-चमन
ज़र्रीं-ओ-सीमीं पैरहन दिलकश मकानों के मकीं
नज़ीर अकबराबादी
कुल्लियात
पूछा किए हैं मुझ से गुल बर्ग लब को तेरे
बुलबुल के हाथ जब मैं गुलज़ार में लगा हूँ