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शेर
हर शख़्स को फ़रेब-ए-नज़र ने किया शिकार
हर शख़्स गुम है गुम्बद-ए-जाँ के हिसार में
फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी
ग़ज़ल
हर शख़्स को फ़रेब-ए-नज़र ने किया शिकार
हर शख़्स गुम है गुम्बद-ए-जाँ के हिसार में
फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी
ग़ज़ल
कोई आज़ुर्दा करता है सजन अपने को हे ज़ालिम
कि दौलत-ख़्वाह अपना 'मज़हर' अपना 'जान-ए-जाँ' अपना
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
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नज़्म
ख़ाक-ए-दिल
अपना हर ख़्वाब-ए-जवाँ सौंप चला हूँ तुझ को
अपना सरमाया-ए-जाँ सौंप चला हूँ तुझ को
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
मुद्दत हुई उस जान-ए-हया ने हम से ये इक़रार किया
जितने भी बदनाम हुए हम उतना उस ने प्यार किया
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
इत्तिहाद
दो शम्ओं' की लौ पेचाँ जैसे इक शो'ला-ए-नौ बन जाने की
दो धारें जैसे मदिरा की भरती हुइ किसी पैमाने की
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
आफ़त-ए-जाँ उस परी से दिल लगाना हो गया
उस को क्या चाहा कि इक दुश्मन ज़माना हो गया
हकीम आग़ा जान ऐश
ग़ज़ल
छुपा रहे न रुख़-ए-यार ज़ुल्फ़ में क्यूँ-कर
तक़य्या फ़र्ज़ है मोमिन को हिफ़्ज़-ए-जाँ के लिए
हकीम आग़ा जान ऐश
रेख़्ती
ऐ 'जान' दिल मैं बेचूँगी अब कौड़ियों के मोल
रहती है मुझ को रोज़ ख़रीदार की तलाश
मीर यार अली जान
ग़ज़ल
वो गर्म-ए-सर्फ़-ए-नाज़ थे वाँ बज़्म-ए-ग़ैर में
सरगर्म उस तरफ़ मिरा दिल सर्फ़-ए-जाँ में था
हकीम आग़ा जान ऐश
रेख़्ती
जाड़े में फूट निकला ये गर्मी का ज़ोर है
ऐ 'जान' किस सिड़न से हुआ तू कहाँ ख़राब