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नज़्म
मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
शाहिद-ए-मज़्मूँ तसद्दुक़ है तिरे अंदाज़ पर
ख़ंदा-ज़न है ग़ुंचा-ए-दिल्ली गुल-ए-शीराज़ पर
अल्लामा इक़बाल
शेर
मिरी 'आशिक़ी सही बे-असर तिरी दिलबरी ने भी क्या किया
वही मैं रहा वही बे-दिली वही रंग-ए-लैल-ओ-नहार है
ए. डी. अज़हर
ग़ज़ल
आले रज़ा रज़ा
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शेर
'अज़फ़री' ग़ुंचा-ए-दिल बंद और आई है बहार
सैर-ए-गुल को कि ये शायद ब-तकल्लुफ़ खिल ले
मिर्ज़ा ज़हीरुद्दीन अज़फ़री
नज़्म
ख़ातून-ए-मशरिक़
ग़ुंचा-ए-दिल मर्द का रोज़-ए-अज़ल जब खुल चुका
जिस क़दर तक़दीर में लिक्खा हुआ था मिल चुका
जोश मलीहाबादी
कुल्लियात
न देखी एक वाशुद अपने दिल की इस गुलिस्ताँ में
खिले पाए हज़ारों ग़ुंचा-ए-दिल-गीर भी आख़िर