सैर-ए-कश्मीर का एक तअस्सुर

जगन्नाथ आज़ाद

सैर-ए-कश्मीर का एक तअस्सुर

जगन्नाथ आज़ाद

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    'आज़ाद'! ज़रा देख तू ये आलम-ए-अर्ज़ंग

    मौसम के ये अंदाज़ बहारों के ये नैरंग

    ये हुस्न, ये तरतीब, ये तज़ईन ये आहंग

    दामान-ए-ख़िरद चाक है दामान-ए-नज़र तंग

    हर ज़र्रा है दामन में लिए तूर की दुनिया

    हर बात में इक बात है हर रंग में सौ रंग

    रूह-ए-बशर! तुझ से हैं दोनों मुतकल्लिम

    सब्ज़े की ख़मोशी है कि झरनों का है आहंग

    अब छोड़ भी अफ़्सुर्दगी अपनी दिल-ए-नादाँ

    अब फूल भी हो खिल के तू ग़ुंचा-ए-दिल-तंग

    हर शय से हुवैदा है झलक हुस्न-ए-अज़ल की

    ज़र्रा है कि तारा है शगूफ़ा है कि है संग

    सब अक्स तिरे अक्स हैं सूरत-ए-पिन्हाँ

    सब रंग तिरे रंग हैं हस्ती-ए-बे-रंग

    देखने वालो! ये ज़रा बात तो देखो

    पत्ते हैं शफ़क़-रंग तो पत्थर हैं समन-रंग

    सब कुछ ये बजा है मगर हुस्न-ए-गुरेज़ाँ

    तू कि तिरी चाल पे क़ुर्बां जमन गंग

    इस राह में गर साथ तिरा हो मयस्सर

    लिद्दर फ़क़त आवाज़ है गुल-मर्ग फ़क़त रंग

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