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नज़्म
आख़िरी लम्हा
रातों की तीरगी है जो पुर-हौल ग़म नहीं
सुब्हों का झाँकता हुआ चेहरा हसीन है
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
यादें
हम सब से हर हाल में लेकिन यूँही हाथ पसार मिले
सिर्फ़ उन की ख़ूबी पे नज़र की इस आबाद ख़राबे में
अख़्तरुल ईमान
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ग़ज़ल
मैं कल और आज में हाएल कोई नादीदा वक़्फ़ा हूँ
मिरे ख़्वाबों से नापा जा रहा है फ़ासला मेरा

