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ग़ज़ल
खड़े कब से हम सर-ए-राह हैं कहीं मर चुकें कि तबाह हैं
हदफ़-ए-ख़दंग-ए-निगाह हैं ज़रा आँख इधर भी मिलाइए
नसीम देहलवी
शेर
शाह नसीर
ग़ज़ल
दिल में उतरी है निगह रह गईं बाहर पलकें
क्या ख़दंग-ए-निगह-ए-यार की हैं पर पलकें
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
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ग़ज़ल
हिसाब-ए-दर्द तो यूँ सब मिरी निगाह में है
जो मुझ पे हो न सकीं वो नवाज़िशें लिखना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
दोनों हों कैसे एक जा 'मेहदी' सुरूर-ओ-सोज़-ए-दिल
बर्क़-ए-निगाह-ए-नाज़ ने गिर के बता दिया कि यूँ
एस ए मेहदी
शेर
दोनों हों कैसे एक जा 'मेहदी' सुरूर-ओ-सोज़-ए-दिल
बर्क़-ए-निगाह-ए-नाज़ ने गिर के बता दिया कि यूँ
एस ए मेहदी
ग़ज़ल
न रहा धुआँ न है कोई बू लो अब आ गए वो सुराग़-जू
है हर इक निगाह गुरेज़-ख़ू पस-ए-इश्तिआ'ल के दरमियाँ
बद्र-ए-आलम ख़लिश
नज़्म
सुब्ह-ए-शब-ए-इंतिज़ार
निगाह को थी मगर मीर-ए-कारवाँ की तलाश
नज़र जो उट्ठी तो देखा कि एक मर्द-ए-फ़क़ीर
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
निगाह-ए-दीदा-ए-ता'बीर के हवाले 'ख़लिश'
है ये बयाज़ अलग इंतिख़ाब-ए-ख़्वाब के साथ
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
जुम्बिश-ए-तेग़-ए-निगह की नहीं हाजत असलन
काम मेरा वो इशारों ही में कर जाते हैं

