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नज़्म
आज़ादी
ये महर-ओ-माह ये तारे ये बाम हफ़्त-अफ़्लाक
बहुत बुलंद है इन से मक़ाम-ए-आज़ादी
फ़िराक़ गोरखपुरी
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ग़ज़ल
हफ़्त अफ़्लाक हैं लेकिन नहीं खुलता ये हिजाब
कौन सा दुश्मन-ए-उश्शाक़ हैं इन सातों में
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल
हफ़्त-ख़्वाँ जिस ने किए तय सर-ए-राह-ए-तस्लीम
टूट जाती है वो हिम्मत मुझे मा'लूम न था
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
ब-क़द्र-ए-हसरत-ए-दिल चाहिए ज़ौक़-ए-मआसी भी
भरूँ यक-गोशा-ए-दामन गर आब-ए-हफ़्त-दरिया हो
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
बुतो ख़ुदा ने कहा फ़िस-सम्मा-ए-रिज़क़ोकुम आप
मिला है मुझ को ये हफ़्त आसिया से दाना-ए-इश्क़
ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर
ग़ज़ल
ज़मीन-ए-तंग से हफ़्त आसमाँ की वुस'अत तक
मैं ढूँढ लाऊँगा तुझ को कहीं से गुज़रेगा
क़मर अब्बास क़मर
ग़ज़ल
ये अजीब माजरा है कि ख़दयू-ए-हफ़्त-क़ुल्ज़ूम
तरफ़-ए-सराब दौड़े पै-ए-क़िस्मत-आज़माई


