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Gariib tere tiin naam , jhuuTaa , paajii , be-iimaan
ग़रीब तेरे तीन नाम , झूटा , पाजी , बे-ईमान غَرِیب تیرے تِین نام ، جُھوٹا ، پاجی ، بے اِیمان
ग़रीब को लोग हक़ारत से याद करते हैं , ग़रीब की हमेशा हर तरह की बे इज़्ज़ती होती है
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ग़ज़ल
अब क्यूँ हरीम-ए-नाज़ में सरमस्तियाँ नहीं
हम वो नहीं कि आप में वो शोख़ियाँ नहीं
सय्यद मज़हर गिलानी
ग़ज़ल
हरीम-ए-नाज़ को हम ग़ैर की महफ़िल नहीं कहते
रक़ीबों पर मगर वो कौन था माइल नहीं कहते
वासिफ़ देहलवी
ग़ज़ल
मुझे ख़बर ही नहीं है हरीम-ए-नाज़ कहाँ
नियाज़-मंद कहाँ और बे-नियाज़ कहाँ
पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़
ग़ज़ल
रह गई आबरू-ए-इश्क़ तेरे हरीम-ए-नाज़ में
ढल गया सोज़-ए-ज़िंदगी मेरे शिकस्ता-साज़ में
अरमान रामपुरी
नज़्म
ख़्वाब जो बिखर गए
बहुत दिनों में रास्ता हरीम-ए-नाज़ का मिला
मगर हरीम-ए-नाज़ तक पहुँच गए तो क्या मिला
आमिर उस्मानी
ग़ज़ल
उस के हरीम-ए-नाज़ तक कोई पहुँच सका कहाँ
राहगुज़ार-ए-शौक़ की ख़ाक उड़ा के भूल जा