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ग़ज़ल
जाँ-सिपारी के भी अरमाँ ज़िंदगी की आस भी
हिफ़्ज़-ए-नामूस-ए-अलम भी नीश-ए-ग़म का पास भी
अख़्तर अंसारी
हास्य
तू हिफ़्ज़-ए-मा-तक़द्दुम और इत्मीनान की ख़ातिर
पकड़ कर मेज़बाँ को पूछ ले आख़िर पका क्या है
ग़ौस ख़ाह मख़ाह हैदराबादी
हास्य
तू हिफ़्ज़-ए-मा-तक़द्दुम और इत्मीनान की ख़ातिर
पकड़ कर मेज़बाँ को पूछ ले आख़िर पका क्या है
ग़ौस ख़ाह मख़ाह हैदराबादी
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नज़्म
वालिदा मरहूमा की याद में
सर्दी-ए-मरक़द से भी अफ़्सुर्दा हो सकता नहीं
ख़ाक में दब कर भी अपना सोज़ खो सकता नहीं
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
उसे मंज़िल से क्या मतलब ज़माना उस की मंज़िल है
ख़याल-ए-मंज़िल-ए-मक़्सद से जो बेगाना हो जाए
वकील भोपाली
ग़ज़ल
तलाश-ए-मंज़िल-ए-मक़्सद की गर्दिश उठ नहीं सकती
कमर खोले हुए रस्ते में हम रहज़न के बैठे हैं
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल
थीं लाख गरचे महशर ओ मरक़द की उलझनें
गुत्थी को ज़ब्त-ए-शौक़ की सुलझा के पी गया
एहसान दानिश कांधलवी
ग़ज़ल
फ़रेब-ए-मंज़िल-ए-मक़्सद से वाक़िफ़ हो गया हूँ मैं
ख़ुदारा आप रहने दीजिए महव-ए-सफ़र मुझ को
शादाब अंजुम
नज़्म
हम तो शाइ'र हैं हम सच नहीं बोलते
फ़स्ल आती है जब हिफ़्ज़-ए-पिंदार की
सच के इज़हार की
सुरूर बाराबंकवी
ग़ज़ल
हिफ़्ज़-ए-नामूस-ए-मोहब्बत के लिए दीवाने
अपने दिल में लिए मरने की लगन उठ्ठे हैं