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ग़ज़ल
आरिज़-ए-रौशन पे जब ज़ुल्फ़ें परेशाँ हो गईं
कुफ़्र की गुमराहियाँ हम-रंग-ए-ईमाँ हो गईं
इस्माइल मेरठी
ग़ज़ल
तस्वीर-ए-ज़ुल्फ़-ओ-आरिज़-ए-गुलफ़ाम ले गया
मुर्ग़ान-ए-क़ुद्स के लिए गुल-दाम ले गया
मुनीर शिकोहाबादी
शेर
जल्वा-गर दिल में ख़याल-ए-आरिज़-ए-जानाना था
घर की ज़ीनत थी कि ज़ीनत-बख़्श साहब-ख़ाना था
हबीब मूसवी
ग़ज़ल
उल्फ़त-ए-आरिज़-ए-लैला में परेशाँ निकला
क़ैस मानिंद-ए-सहर चाक-गरेबाँ निकला
मिर्ज़ा अल्ताफ़ हुसैन आलिम लखनवी
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शेर
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
ख़याल-ए-आरिज़-ए-रौशन में सुब्ह-ओ-शाम यकसाँ है
यहाँ आठों-पहर पेश-ए-नज़र है नूर का तड़का
नसीम देहलवी
नज़्म
शाइ'र
आज फिर सँवला रहा है आरिज़-ए-रू-ए-हयात
मौत के क़ानून पर है ज़िंदगी का गर्म हाथ
अख़्तर पयामी
ग़ज़ल
अहमद हुसैन माइल
ग़ज़ल
वफ़ूर-ए-ज़र वफ़ूर-ए-ऐश में तो बारहा 'रौशन'
बहुत से लोग ऐसे हैं ख़ुदा को भूल जाते हैं
रौशन लाल रौशन
ग़ज़ल
चलो अच्छा ही हुआ मुफ़्त लुटा दी ये जिंस
हम को मिलता सिला-ए-हुस्न-ए-नज़र ही कितना

