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ग़ज़ल
हुज़ूर-ए-पीर-ए-मुग़ाँ लग़्ज़िशों की पुर्सिश है
लो आओ अपने भी क़दमों को सरफ़राज़ करें
मुज़फ़्फ़र शिकोह
नज़्म
हम लोग
ख़ाकसारान-ए-दर-ए-पीर-ए-मुग़ाँ हैं हम लोग
या'नी मिनजुमला-ए-साहिब-नज़राँ हैं हम लोग
अली मीनाई
ग़ज़ल
हम जो मस्जिद से दर-ए-पीर-ए-मुग़ाँ तक पहुँचे
बढ़ के ये बात ख़ुदा जाने कहाँ तक पहुँचे
साहिर सियालकोटी
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ग़ज़ल
रिंदों में यूँ ही बख़्शिश-ए-पीर-ए-मुग़ाँ रहे
हो लाख क़हत फिर भी ये दरिया रवाँ रहे
अब्दुस्सलाम नदवी
ग़ज़ल
जिगर बरेलवी
शेर
क़द्र मुझ रिंद की तुझ को नहीं ऐ पीर-ए-मुग़ाँ
तौबा कर लूँ तो कभी मय-कदा आबाद न हो

