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ग़ज़ल
'फ़ज़ा' तुम उलझे रहे फ़िक्र ओ फ़लसफ़े में यहाँ
ब-नाम-ए-इश्क़ वहाँ क़ुरअ-ए-हुनर निकला
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
ख़ल्लाक़-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ बड़ा दिल-नवाज़ है
तख़्लीक़-ए-शम्अ' होते ही परवाना बन गया
आले रज़ा रज़ा
ग़ज़ल
आले रज़ा रज़ा
ग़ज़ल
सीने में दिल-ए-ग़म-ज़दा ख़ूँ हो गया शायद
बे-वज्ह भी होते हैं कहीं अश्क-ए-रवाँ सुर्ख़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
हाथ से उन के टपकते नहीं मय के क़तरे
अश्क-ए-ख़ूँ रोता है ये रंग-ए-हिना मेरे ब'अद


