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ग़ज़ल
हमेशा चाहता है दिल कि मिल कर कीजे मय-नोशी
मयस्सर जाम-ए-मय-ए-जम-जम हमें भी हो तुम्हें भी हो
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
मुझे तो जाम-ओ-मय-ओ-गुल का इंतिज़ार नहीं
मैं ख़ुद बहार हूँ मेरे लिए बहार नहीं
अब्दुल मजीद दर्द भोपाली
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रेख़्ता शब्दकोश
KHudaa se kaam hai
ख़ुदा से काम हैخُدا سے کام ہے
बंदा और अल्लाह के दरमयान ताल्लुक़ है , मुराद : आलिम नज़ा, दम-ए-वापसीं
kaam se kaam hai
काम से काम हैکام سے کام ہے
۔اپنے مطلب سے غرض ہے اور کسی بات کی پرواہ نہیں۔ ؎
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अप्रचलित ग़ज़लें
ضمان جادہ رویاندن ہے خط جام مے نوشاں
دگر نہ منزل حیرت سے کیا واقف ہیں مدہوشاں
मिर्ज़ा ग़ालिब
शेर
भर के साक़ी जाम-ए-मय इक और ला और जल्द ला
उन नशीली अँखड़ियों में फिर हिजाब आने को है
फ़ानी बदायुनी
ग़ज़ल
दिल को चश्म-ए-यार ने जब जाम-ए-मय अपना दिया
उन से ख़ुश हो कर लिया और कह के बिस्मिल्लाह पिया
नज़ीर अकबराबादी
शेर
इक जाम-ए-मय की ख़ातिर पलकों से ये मुसाफ़िर
जारोब-कश रहा है बरसों दर-ए-मुग़ाँ का