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ग़ज़ल
जाम-ए-सिफ़ाल-ओ-जाम-ए-जम कुछ भी तो हम न बन सके
और बिखर बिखर गए कूज़ा-गरों के दरमियाँ
रज़ी अख़्तर शौक़
अप्रचलित ग़ज़लें
ضمان جادہ رویاندن ہے خط جام مے نوشاں
دگر نہ منزل حیرت سے کیا واقف ہیں مدہوشاں
मिर्ज़ा ग़ालिब
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ग़ज़ल
हिक़ारत से न देखो दिल को जाम-ए-जम भी कहते हैं
इसी ख़ाक-ए-तपाँ को फ़ातेह-ए-आलम भी कहते हैं
सहाब क़ज़लबाश
ग़ज़ल
सब के हाथों पे था शब-भर सफ़र-ए-जाम-ए-शराब
हर ख़त-ए-दस्त बना रह-गुज़र-ए-जाम-ए-शराब
अहमद हुसैन माइल
ग़ज़ल
पन्ना लाल नूर
ग़ज़ल
रिवाज-ए-जाम-ओ-सुबू से बचा बचा के पिला
पिलाने वाले नज़र से नज़र मिला के पिला
कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर
ग़ज़ल
ख़म लुंढा दूँ तो न चकराए कभी सर मेरा
एक जुरआ में गया बुल-हवस-ए-जाम-ए-शराब