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नज़्म
ख़बर है कि नहीं
अब भी तकती हैं मिरी राह वो काफ़िर आँखें
अब भी दुज़्दीदा नज़र जानिब-ए-दर है कि नहीं
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
है शब-ए-वस्ल मय-ए-वस्ल पियो तुम बे-ख़ौफ़
आँख क्यों आप की है जानिब-ए-दर कुछ भी नहीं