आपकी खोज से संबंधित
परिणाम "jabiin-e-sub.h"
अत्यधिक संबंधित परिणाम "jabiin-e-sub.h"
ग़ज़ल
मिरे लहू से है रंगीं जबीन-ए-सुब्ह तो क्या
चलो कि ज़ुल्मत-ए-शब का तो हौसला निकला
अब्दुल हफ़ीज़ नईमी
ग़ज़ल
'फ़ज़ा' है ख़ालिक़-ए-सुब्ह-ए-हयात फिर भी ग़रीब
कहाँ कहाँ न उफ़ुक़ की तलाश में डूबा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
अन्य परिणाम "jabiin-e-sub.h"
ग़ज़ल
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
नज़्म
उजाले की लकीर
इक नई सुब्ह-ए-दरख़्शाँ का रूपहला आँचल
अपने हमराह लिए अज़्म-ए-जवाँ की तनवीर
नूर-ए-शमा नूर
नज़्म
अहल-ए-जुनूँ
वो लहू अपने ही माथे से बहा है जिस से
आज दीवार-ए-ख़िरद की है लहू-रंग जबीं
नूर-ए-शमा नूर
नज़्म
गुलहा-ए-अक़ीदत
सुब्ह-दम बाद-ए-सबा की शोख़ियाँ काम आ गईं
लाला-ओ-गुल को बग़ल-गीरी का मौक़ा मिल गया
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
कहीं सुब्ह-ओ-शाम के दरमियाँ कहीं माह-ओ-साल के दरमियाँ
ये मिरे वजूद की सल्तनत है अजब ज़वाल के दरमियाँ
बद्र-ए-आलम ख़लिश
नज़्म
सुब्ह-ए-शब-ए-इंतिज़ार
चराग़ राह में उस के अमल से जलने लगे
लो आज सुब्ह-ए-शब-ए-इंतिज़ार आ ही गई
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
जो भी हैं सुब्ह-ए-वतन ही के परस्तारों में हैं
किन से हम ऐ शाम-ए-ग़ुर्बत तेरा अफ़्साना कहें
कँवल एम ए
ग़ज़ल
फैला हुआ है बाग़ में हर सम्त नूर-व-सुब्ह
बुलबुल के चहचहों से है ज़ाहिर सुरूर-ए-सुब्ह