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नज़्म
दोस्ती का हाथ
बसारतों पे वो जाले पड़े कि दोनों को
समझ में कुछ नहीं आता कि माजरा क्या है
अहमद फ़राज़
नज़्म
परछाइयाँ
न जाने कितनी कशाकश से कितनी काविश से
ये सोते जागते लम्हे चुरा के लाए हैं
साहिर लुधियानवी
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नज़्म
रूह देखी है कभी!
अपनी गहनाती हुई कोख को महसूस किया है?
जिस्म सौ बार जले तब भी वही मिट्टी है
गुलज़ार
नज़्म
मुफ़्लिसी
ये दुख वो जाने जिस पे कि आती है मुफ़्लिसी
कहिए तो अब हकीम की सब से बड़ी है शाँ





