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ग़ज़ल
किसी की हुस्न-ए-नज़र का ये फ़ैज़ है मुझ पर
'हुनर' के चेहरे से रौशन हुआ जमाल का रंग
हुनर रसूलपुरी
ग़ज़ल
ग़ैर हों कि अपने हों सब से झुक के मिलता हूँ
ऐ 'हुनर' नहीं आदत मुझ को ख़ुद-सताई की
पूरन सिंह हुनर
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ग़ज़ल
हिसार-ए-हर्फ़-ओ--हुनर तोड़ कर निकल जाऊँ
कहाँ पहुँच के ख़याल अपनी वुसअ'तों का हुआ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
'फ़ज़ा' तुझी को ये सफ़्फ़ाकी-ए-हुनर भी मिली
इक एक लफ़्ज़ को यूँ बे-लिबास कर जाना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
'फ़ज़ा' तुम उलझे रहे फ़िक्र ओ फ़लसफ़े में यहाँ
ब-नाम-ए-इश्क़ वहाँ क़ुरअ-ए-हुनर निकला
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
मैं ही तन्हा हूँ यहाँ उस की सलाबत का गवाह
कौन उठा कर ये मिरा संग-ए-हुनर ले जाएगा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
जिस तरफ़ देखो हुजूम-ए-चेहरा-ए-बे-चेरगाँ
किस घने जंगल में यारो गुम हुआ सब का हुनर