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ग़ज़ल
ये भी कमाल ही तो है क़ाबिल-ए-दाद साहिबान
आज कलाम-ए-'जश्न' में कोई कमाल भी नहीं
सुनील कुमार जश्न
ग़ज़ल
उस की क्या वज्ह मिरे होते वहाँ क्यूँ न रहें
क्यूँ रहे ज़ुल्फ़-ए-सियह आप के रुख़्सार के पास
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
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नज़्म
अजब है खेल कैरम का
करेगी कमरे का रुख़ जब कनीज़-ए-ख़ास हमराह हो
सियाह हो चाहे गोरी हो मगर वो साथ में जाए
इब्न-ए-मुफ़्ती
नज़्म
शिकस्त-ए-ज़िंदाँ
रबाब छेड़ ग़ज़ल-ख़्वाँ हो रक़्स-फ़रमा हो
कि जश्न-ए-नुसरत-ए-मेहनत है जश्न-ए-नुसरत-ए-फ़न
साहिर लुधियानवी
नज़्म
हम
अपनी प्यास इक दूसरे के ख़ूँ से बुझा रही है
ये संग-दिल जश्न-ए-मर्ग-ए-अम्बोह-ए-बे-गुनाहाँ मना रहे हैं
ज़िया जालंधरी
नज़्म
चराग़ाँ
लम्हा लम्हा मुसलसल लहू के तसलसुल में जलता रहूँ
उस के रौशन चराग़ों में जश्न-ए-जमाल-ए-तुलू’-ए-सहर तक
बलराज कोमल
नज़्म
जश्न-ए-आज़ादी
जश्न-ए-आज़ादी-ए-जम्हूर मनाएँ लोगो
गोशे गोशे में मुसावात का चर्चा कर दें
मसूदा हयात
नज़्म
खिलता हुआ गुलाब है 26 जनवरी
इक जश्न-ए-आब-ओ-ताब है छब्बीस जनवरी
खिलता हुआ गुलाब है छब्बीस जनवरी
शौकत परदेसी
नज़्म
चुप न रहो
रोज़ हो जश्न-ए-शहीदान-ए-वफ़ा चुप न रहो
बार बार आती है मक़्तल से सदा चुप न रहो