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ग़ज़ल
करते भी तलब क्या क्या यहाँ दश्त-ए-अता में
देने को न था जिंस-ए-मयस्सर के सिवा कुछ
नश्तर ख़ानक़ाही
ग़ज़ल
चलो अच्छा ही हुआ मुफ़्त लुटा दी ये जिंस
हम को मिलता सिला-ए-हुस्न-ए-नज़र ही कितना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
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ग़ज़ल
हम दिल को लिए हर देस फिरे इस जिंस के गाहक मिल न सके
ऐ बंजारो हम लोग चले हम को तो ख़सारा होता है
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
शेर
बद-क़िस्मतों को गर हो मयस्सर शब-ए-विसाल
सूरज ग़ुरूब होते ही ज़ाहिर हो नूर-ए-सुब्ह
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
बद-क़िस्मतों को गर हो मयस्सर शब-ए-विसाल
सूरज ग़ुरूब होते ही ज़ाहिर हो नूर-व-सुब्ह
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
मयस्सर हो तो क़द्रे लुत्फ़ भी नेमत है याँ यारो
किसी का वादा-ए-ऐश-ए-दवाम अच्छा नहीं लगता
आल-ए-अहमद सुरूर
नज़्म
क्या कह गई है बाग़ से बाद-ए-ख़िज़ाँ न पूछ
क्यूँकर लुटी है जिन्स-ए-गिराँ-माया-ए-नशात
वीराँ हुआ है कैसे भरा आशियाँ न पूछ
इनाम थानवी
नज़्म
शिकवा
जिंस-ए-नायाब-ए-मोहब्बत को फिर अर्ज़ां कर दे
हिन्द के दैर-नशीनों को मुसलमाँ कर दे