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नज़्म
नक़्क़ाद
जू-ए-क़ुदरत की रवानी दश्त-ए-मस्नूआत में
टूटना रंगीं सितारे का अँधेरी रात में
जोश मलीहाबादी
नज़्म
किसी की सदा
ज़र्रा ज़र्रा झूम कर लेने लगा अंगड़ाइयाँ
कहकशाँ तकने लगी हैरत से सू-ए-जू-ए-बार
इब्न-ए-सफ़ी
ग़ज़ल
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
ऐसी बस्ती में मियाँ अम्न-ओ-अमाँ का क्या सवाल
सुल्ह-जू कम हों जहाँ पर और बलवाई बहुत
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
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ग़ज़ल
हमें तो कार-पर्दाज़ान-ए-क़ुदरत खेल समझे हैं
कभी आबाद करते हैं कभी बर्बाद करते हैं
हफ़ीज़ जालंधरी
नज़्म
किसान
तिफ़्ल-ए-बाराँ ताजदार-ए-ख़ाक अमीर-ए-बोस्ताँ
माहिर-ए-आईन-ए-क़ुदरत नाज़िम-ए-बज़्म-ए-जहाँ
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
दिखाया हुस्न से एजाज़-ए-मूसी किल्क-ए-क़ुदरत ने
यद-ए-बैज़ा बनाया चूर अंगुश्त-ए-हिनाई का
हैदर अली आतिश
नज़्म
श्री-कृष्णा
किल्क-ए-क़ुदरत से है इंसान की तक़दीर बनी
ख़ाक के ज़र्रों से है ख़ाक की तस्वीर बनी
बिस्मिल इलाहाबादी
ग़ज़ल
काट कर रातों के पर्बत अस्र-ए-नौ के तेशा-ज़न
जू-ए-शीर-ओ-चश्मा-ए-नूर-ए-सहर लाते रहे
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
ख़ाक-ए-हिंद
ऐ ख़ाक-ए-हिंद तेरी अज़्मत में क्या गुमाँ है
दरिया-ए-फ़ैज़-ए-क़ुदरत तेरे लिए रवाँ है