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ग़ज़ल
हम अपनी माँ की नज़रों में वही मासूम बच्चे हैं
चपत वो प्यार से अब भी हमारे मार देती है
मशकूर ममनून क़न्नौजी
नज़्म
क्यूँ आख़िर मुझे शैतान कहते हैं
तो क्या ये दिल नहीं कहता
चपत इक आध जड़ने को
हामिद इक़बाल सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
तग़ाफ़ुल छोड़ना ज़ालिम बे-तकल्लुफ़ हो सितम मत कर
कपट की आश्नाई ये नहीं सकती निबह हम सीं
आबरू शाह मुबारक
ग़ज़ल
वाँ खपत ही नहीं क्या जिंस-ए-वफ़ा ले जाएँ
उन की सरकार में इक जौर-ओ-सितम का है बनाव

