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नज़्म
क्या कहिए
कस्ब-ए-मुतहर्रिक से पा-बस्ता नसब तुग़रे
ये क्या है कोई अहल-ए-ख़ातम से नहीं कहता
मीम हसन लतीफ़ी
ग़ज़ल
हुसूल-ए-ज़र न कस्ब-ए-रुत्बा-ए-ज़ी-शाँ पे रक्खी है
नज़र हम ने हमेशा ख़िदमत-ए-इंसाँ पे रक्खी है
मोहम्मद ख़ाँ साजिद
नज़्म
मेरा वतन
तो ने कस्ब-ए-फ़ुनून-ए-जंग किया
सब में शोहरत है तेरी क़ुव्वत की
मीर सय्यद नज़ीर हुसैन नाशाद
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ग़ज़ल
ये मुनहसिर है कस्ब-ए-हलाल-ओ-हराम पर
होता है अब दुआ में असर कम बहुत ही कम
मोहम्मद शरफ़ुद्दीन साहिल
ग़ज़ल
हम ने क्या तरक़्क़ी की कस्ब-ए-इल्म-ओ-फ़न कर के
बावजूद-ए-कोशिश भी ख़ुद को बे-हुनर पाया
नुद्रत कानपुरी
ग़ज़ल
शोहरत की तलब है कि है इज़हार का चसका
ये कसब-ए-सताइश है कि फिर कस्ब-ए-हुनर है