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नज़्म
क्या कहिए
कस्ब-ए-मुतहर्रिक से पा-बस्ता नसब तुग़रे
ये क्या है कोई अहल-ए-ख़ातम से नहीं कहता
मीम हसन लतीफ़ी
ग़ज़ल
हुसूल-ए-ज़र न कस्ब-ए-रुत्बा-ए-ज़ी-शाँ पे रक्खी है
नज़र हम ने हमेशा ख़िदमत-ए-इंसाँ पे रक्खी है
मोहम्मद ख़ाँ साजिद
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ग़ज़ल
शोहरत की तलब है कि है इज़हार का चसका
ये कसब-ए-सताइश है कि फिर कस्ब-ए-हुनर है
मोहम्मद अकरम जाज़िब
ग़ज़ल
हम ने क्या तरक़्क़ी की कस्ब-ए-इल्म-ओ-फ़न कर के
बावजूद-ए-कोशिश भी ख़ुद को बे-हुनर पाया
नुद्रत कानपुरी
हास्य
कस्ब-ए-ज़र सब के लिए तुझ को ग़ज़ल-ख़्वानी मिली
मुफ़्त की बे-गार करने को सुख़न-दानी मिली
ज़रीफ़ लखनवी
ग़ज़ल
ले जाएँ अपनी बे-हुनरों पास-ए-इल्तिजा
रखते हैं लोग इस लिए कस्ब-ए-हुनर अज़ीज़
क़ुर्बान अली सालिक बेग
ग़ज़ल
जो कसब-ए-रिज़्क़ में ने'मत का पा गया मफ़्हूम
उसी अमीर का दिल भी फ़राग़ रहता है
मोहम्मद शरफ़ुद्दीन साहिल
ग़ज़ल
ख़ूब है सज़ा ये भी कस्ब-ए-कामयाबी की
एक शब की क़ीमत में अब तो उम्र-भर जागो