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नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
वो सारे ख़्वाब थे क़स्साब जो देखा किया हूँ मैं
ख़राश-ए-दिल से तुम बे-रिश्ता बे-मक़्दूर ही ठहरो
जौन एलिया
नज़्म
मिट्टी का दिया
बानियों ने था बनाया इस लिए गोया हमें
हम को जब देखें ख़लफ़ अस्लाफ़ को रोया करें
अल्ताफ़ हुसैन हाली
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ग़ज़ल
न यूँ माँ-बाप अपनी ना-ख़लफ़ औलाद को रोते
अगर हर एक दिन उन का न फ़ाक़ों में ढला होता
अब्दुर्रज़्ज़ाक़ दिल
ग़ज़ल
शान-ए-इश्क़ औला है मजनूँ दूदमान-ए-इश्क़ से
ना-ख़लफ़ ना-क़ाबिल ओ नालायक़ ओ नाकारा था
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
अगर हो जाए बेटा ना-ख़लफ़ तो बूढ़ी आँखों के
सजे होते हैं जितने भी वो सपने टूट जाते हैं
नईम वाक़िफ़
ग़ज़ल
ख़ुदा ने जब मुझ बशर को अपना ख़लफ़ बनाया सवाल ये है
तो मैं ने क्यों आसमान सर पर नहीं उठाया सवाल ये है
इदरीस आज़ाद
नज़्म
ना-ख़लफ़ मिज़ाज की मुसद्दक़ा तस्लीमात
मेरे बदन की चार दीवारी के लिए
खनकती हुई मिट्टी कम थी
सिदरा सहर इमरान
कुल्लियात
इश्क़ में वो घर है अपना जिस में से मजनूँ ये एक
ना-ख़लफ़ सारे क़बीले का हमारे नंग है






