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नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
ख़राश-ए-दिल से तुम बे-रिश्ता बे-मक़्दूर ही ठहरो
मिरे जहमीम-ए-ज़ात-ए-ज़ात से तुम दूर ही ठहरो
जौन एलिया
ग़ज़ल
मोमिन ख़ाँ मोमिन
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ग़ज़ल
जुनूँ तोहमत-कश-ए-तस्कीं न हो गर शादमानी की
नमक-पाश-ए-ख़राश-ए-दिल है लज़्ज़त ज़िंदगानी की
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
देख कर क़ातिल को भर लाए ख़राश-ए-दिल में ख़ूँ
सच तो ये है मुस्कुराना कोई हम से सीख जाए
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
नज़्म
हुस्न और मज़दूरी
गर्दन-ए-हक़ पर ख़राश-ए-तेग़-ए-बातिल ता-ब-कै?
अहल-ए-दिल के वास्ते तौक़-ओ-सलासिल ता-ब-कै?
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
दिल से निकली न ख़राश-ए-ग़म-ए-अय्याम की धूप
तेरे नाख़ुन से कई चाँद बनाए हम ने
सुलैमान अरीब हैदराबादी
नज़्म
गुल-ए-रंगीं
तू शनासा-ए-ख़राश-ए-उक़्दा-ए-मुश्किल नहीं
ऐ गुल-ए-रंगीं तिरे पहलू में शायद दिल नहीं
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
वो ख़राश-ए-दिल जो ऐ जज़्बा-ए-जज़्बी मेरी हमराज़ थी
आज उसे भी ज़ख़्म बन कर मुस्कुराना आ गया
मुईन अहसन जज़्बी
कुल्लियात
ख़राश-ए-सीना-ए-आशिक़ भी दिल को लग जाए
अजब तरह का है फ़िरक़ा ये दिल-फ़िगारों का

