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नज़्म
ईद
रुख़ों पे फूल खिलाएँ कि जश्न का दिन है
दिलों में प्रीत जगाएँ कि जश्न का दिन है
शिफ़ा कजगावन्वी
ग़ज़ल
जब दुनिया पर बस न चले तो अंदर अंदर कुढ़ना क्या
कुछ बेले के फूल खिलाएँ आँगन की फुलवारी में
अज़रा नक़वी
ग़ज़ल
तपते हुए सहरा में भी कुछ फूल खिलाएँ
कब तक लब-ओ-रुख़्सार का अफ़्साना कहा जाए
मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद
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रेख़्ता शब्दकोश
khilaan
खिलान کِھلان
کِھلنا (رک) کا حاصلِ مصدر یا اسمِ کیفیت نیز کھلانا کی تخفیف ، تراکیب میں مستعمل رہا.
khilaan-haaraa
खिलान-हारा کِھلان ہارا
खिलाने वला, प्रफुल्लित करने वाला
dhaan kii khiile.n
धान की खीलें دھان کی کِھیلیں
भुने हुए धान जो फूले हुए और कुरकुरे होते हैं
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ग़ज़ल
नए शगूफ़े न क्यूँ खिलाएँ जो ग़ुंचा-ओ-गुल को देख पाएँ
बहार तो है चमन की रानी चमन की रानी है और हम हैं
नूह नारवी
ग़ज़ल
लौंग खिलाएँ हम जो कभी तो उस को डालो मुँह से थूक
और ये क्यूँ जी रोज़ मुफ़र्रेह छींके खानी औरों से
मारूफ़ देहलवी
नज़्म
परियों का नाच
बैठ के उठें उठ कर बैठें बैठ के फिर उठ जाएँ
नाचें गाएँ शोर मचाएँ दिल की कली खिलाएँ


