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नज़्म
रक़ीब से!
तुझ पे उट्ठी हैं वो खोई हुई साहिर आँखें
तुझ को मालूम है क्यूँ उम्र गँवा दी हम ने
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़ज़ल
तुम्हारे नाम से सब लोग मुझ को जान जाते हैं
मैं वो खोई हुई इक चीज़ हूँ जिस का पता तुम हो
मुज़्तर ख़ैराबादी
नज़्म
तो बेहतर है यही
तेरी खोई मुस्कुराहट क़हक़हों में ढल गई
मेरा गुम-गश्ता सुकूँ फिर से मिरे पास आ गया
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
कोई मर कर तो देखे इम्तिहाँ-गाह-ए-मोहब्बत में
कि ज़ेर-ए-ख़ंजर-ए-क़ातिल हयात-ए-जावेदाँ तक है
बेदम शाह वारसी
नज़्म
बरसात की बहारें
गाती है गीत कोई झूले पे कर के फेरा
मारो जी आज कीजिए याँ रैन का बसेरा

