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ग़ज़ल
जयकृष्ण चौधरी हबीब
ग़ज़ल
हर एक दौर में इंसाँ की बूद-ओ-बाश मिली
किसी ज़मीं को भी खोदा तो मेरी लाश मिली
इंद्र मोहन मेहता कैफ़
ग़ज़ल
तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा
दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें
अहमद फ़राज़
शेर
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है




