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ग़ज़ल
खुले थे शहर में सौ दर मगर इक हद के अंदर ही
कहाँ जाता अगर मैं लौट के फिर घर नहीं जाता
वसीम बरेलवी
शेर
ये उड़ी उड़ी सी रंगत ये खुले खुले से गेसू
तिरी सुब्ह कह रही है तिरी रात का फ़साना
एहसान दानिश कांधलवी
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नज़्म
ख़्वाब जो बिखर गए
क़दम क़दम खुले हुए हैं मक्र-ओ-फ़न के मदरसे
मगर ये मेरी सादगी तो देखिए कि आज भी
आमिर उस्मानी
ग़ज़ल
ये वो माजरा-ए-फ़िराक़ है जो मोहब्बतों से न खुल सका
कि मोहब्बतों ही के दरमियाँ सबब-ए-जफ़ा कोई और है
नसीर तुराबी
नज़्म
सरहदें
इस तवक़्क़ो पे कि शायद कोई मेहमाँ आ जाए
घर के दरवाज़े खुले छोड़ के सो जाते थे

