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नज़्म
ख़ुशामद
हक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है
मर्द ओ ज़न तिफ़्ल ओ जवाँ ख़ुर्द ओ कलाँ पीर ओ फ़क़ीर
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
हो अगर मक़्सद में नाकामी तो कर सकते हैं सब्र
दर्द-ए-ख़ुद-कामी को लेकिन बे-दवा पाते हैं हम
अल्ताफ़ हुसैन हाली
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नज़्म
हिलाल-ए-ईद
मस्जिदों में सब जम्अ' हो जाएँगे ख़ुर्द-ओ-कलाँ
दूर हो दिल की कुदूरत ये सवाल-ए-ईद है
निसार कुबरा अज़ीमाबादी
नज़्म
सलाम
'ताहिरा' सालगिरह आज है आज़ादी की
हिन्द के ख़ुर्द-ओ-कलाँ साथियों प्यारों को सलाम
बनो ताहिरा सईद
ग़ज़ल
सब एक रंग में हैं मय-कदे के ख़ुर्द ओ कलाँ
यहाँ तफ़ावुत-ए-पीर-ओ-जवाँ नहीं होता
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मज्ज़ूब
उद्धरण
सआदत हसन मंटो
उद्धरण
कुत्ते की उर्दू में ले दे के दो क़िस्में हैं। दूसरी को बिरादर-ए-ख़ुर्द कहते हैं।...
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
नज़्म
15 अगस्त (1949)
हर ख़ुर्द-ओ-कलाँ हर पीर-ओ-जवाँ है आज निदा-ए-आज़ादी
ये कोशिश सब पर लाज़िम है दाइम हो बक़ा-ए-आज़ादी
अर्श मलसियानी
नज़्म
होली
अज़हर है सब कहे हैं मिल कर शरीर तुझ को
करते हैं अब मलामत ख़ुर्द-ओ-कबीर तुझ को
नज़ीर अकबराबादी
हास्य
वो क़ैंची की तरह अपनी ज़बाँ जिस दम चलाती है
वो ख़ुद-सर एक पल में सारा घर सर पर उठाती है
असद जाफ़री
ग़ज़ल
अदा वो नीची निगाहों की है कि जैसे 'ज़फ़र'
तलाश-ए-कुंज-ए-ग़ज़ालान-ए-ख़ुर्द-साला करें

