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नज़्म
रिवायत न टूटे
कि जिन को जलापे की मुद्दत गुज़रने पे
उन कोएलों की जगह हीरे मोती मिले
किश्वर नाहीद
ग़ज़ल
ख़ाल-ए-मुश्कीं ने दिल ऐसा ही जलाया है कि बस
कोएलों पर भी ये धोका है कि अंगारे हैं
इमदाद अली बहर
ग़ज़ल
कभी नौ-बहार बन कर हो चमन चमन में रक़्साँ
कभी कोएलों के लब पर कभी गुल से आश्कारा
इफ़्फ़त ज़ेबा काकोरवी
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नज़्म
तुम रूह के साज़ पे
तो तुम से मुस्तआ'र ले लूँगा ये एहतियात
तुम अपने घर की अँगेठी में कड़कड़ाती लकड़ियों के कोएलों से
ज़ाहिद हसन
नज़्म
मौसम-ए-बहार
जुनूँ-फ़ज़ा कूक कोएलों की ग़ज़ब पपीहा की पी कहाँ है
चटक कली की है एक आफ़त सितम है बुलबुल का हर तराना


