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ग़ज़ल
अब तो उस सूने माथे पर कोरे-पन की चादर है
अम्मा जी की सारी सज-धज सब ज़ेवर थे बाबू जी
आलोक श्रीवास्तव
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ग़ज़ल
लम्स के इस कोरे तालाब में चाँद का पहला अक्स तुम्ही हो
कैसे नूर-जहानी सुर में किस किस से वो कहता होगा
अहमद फ़क़ीह
नज़्म
दीवाली और दीवाली मिलन
उन से अच्छे तो माटी के कोरे दिए
जिन से दहलीज़ रौशन है आँगन चमन
नज़ीर बनारसी
ग़ज़ल
वो था कुछ उस के बच्चे थे कुछ साथ थे और कुछ घर वाले
आईने से कोरे दिल वाले कोहसार से ऊँचे सर वाले
सईद अहमद अख़्तर
नज़्म
मताअ-ए-राएगाँ
तुझे सब ढूँडते हैं इस तरह अंधे हैं सब जैसे
इसी कोरे वरक़ पर कुछ इबारत भी उन्हें दे दे

