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नज़्म
निसार मैं तेरी गलियों के
जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले जिस्म ओ जाँ बचा के चले
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
कलीद-ए-किश्त-ज़ार-ए-ख़्वाब भी गुम हो गई आख़िर
कहाँ अब जादा-ए-ख़ुर्रम में सर-सब्ज़ाना जाना है
जौन एलिया
नज़्म
मुहासरा
तमाम सूफ़ी ओ सालिक सभी शुयूख़ ओ इमाम
उमीद-ए-लुत्फ़ पे ऐवान-ए-कज-कुलाह में हैं
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
बे-साख़्ता निगाहें जो आपस में मिल गईं
क्या मुँह पर उस ने रख लिए आँखें चुरा के हाथ
निज़ाम रामपुरी
ग़ज़ल
चुरा के ख़्वाब वो आँखों को रेहन रखता है
और उस के सर कोई इल्ज़ाम भी नहीं आता
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
नज़्म
परछाइयाँ
न जाने कितनी कशाकश से कितनी काविश से
ये सोते जागते लम्हे चुरा के लाए हैं
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
मुझ को ख़राब कर गईं नीम-निगाहियाँ तिरी
मुझ से हयात ओ मौत भी आँखें चुरा के रह गईं






